ऐ ख़ामोशी
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ऐ ख़ामोशी |
ऐ ख़ामोशी तू हर
बार मेरे चेहरे पर
आकर कई लक़ीर खींच
जाती है ,
और ना जाने मैं बेख़बर
हर बार तुझे अपना
बना लेती हूँ ,
कभी - कभी तो मन
करता है जी भर रोऊ ,
फिर सोचती हूँ क्यों
ना मुस्कुरा ही दू ,
हर बार की तरह अश्क
छुपा ही लू ,
और एक प्यारी -सी
मुस्कान को अपना लू ,
क्योकि ये ज़ालिम दुनिया
मुझे रोते हुए
देखकर हस देती है ,
और मेरे अश्क हर बार'
रुक जाते है ,
वहाँ जहाँ उनकी अब
जगह ही नहीं',
ऐ ख़ामोशी तू हर'
बार मेरे चेहरे पर .....
- शैफाली

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