मैं अब तक समझ नहीं पाई....

मैं  अब  तक  समझ  नहीं  पाई ....

मैं  अब  तक  समझ  नहीं  पाई

        मैं  अब  तक  समझ  नहीं  पाई

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मैं अब तक समझ  नहीं  पाई 
कब मैं बचपन छोड़  चली अपना 
वो प्यारी यादे , वो प्यारे लम्हे ,
कहीं खो गए है मेरे ,
नन्हे दिमाग की शरारते 
आज" कैरियर" के बारे 
मे सोचते  है ,
वो पैसे बचाने की आदते 
आज मुझे याद आते है ,
कभी खुल के रोती थी मैं 
आज उन्हीं अश्क़ को 
छुपाती हूँ  मैं ,
कभी यहाँ खेला करती थी 
मैं घर -घर ,
आज अपना ही घर छोड़
चली हूँ  मैं ,
कभी उन रास्तों पर 
चली ना थीं  मैं ,
जो आज मेरी मंज़िल 
बन गयी ,
इतने भीड़भाड़ वाले 
शहर मे भी ,
अकेली रह गई हूँ  मैं 
इतने लोगों के बीच 
रहकर भी तन्हा हो 
गई हूँ मैं ,
ना जाने किस -किस से 
नाता जोड़ चुकी हूँ  मैं,
पराये-पन मे भी 
अपना अस्तित्व ढूंढ 
चुकी हूँ  मैं ,
कभी सोचा ना था 
अपने सपनों  के लिये 
अपने आप से ही
लड़ूंगी मैं ,
मैं  अब तक समझ 
नहीं पायी,
कब नन्ही  से बड़ी 
हो चली  मैं। 

               -शैफाली 


  








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